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अरब में अशांति : सीरिया में अमन की उम्मीद

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सीरिया में 2011 से जारी हिंसा के थमने के आसार हैं. लाखों मौतों, लाखों शरणार्थियों और भयावह तबाही के लंबे दौर से सीरियाई लोगों को निजात दिलाने के लिए विभिन्न पक्षों के बीच वार्ताओं का सिलसिला इस महीने से शुरू होगा. मौजूदा राजनीतिक स्थिति और बातचीत के संभावित परिणामों पर िवश्लेषण आज के इन-डेप्थ में… […]

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सीरिया में 2011 से जारी हिंसा के थमने के आसार हैं. लाखों मौतों, लाखों शरणार्थियों और भयावह तबाही के लंबे दौर से सीरियाई लोगों को निजात दिलाने के लिए विभिन्न पक्षों के बीच वार्ताओं का सिलसिला इस महीने से शुरू होगा. मौजूदा राजनीतिक स्थिति और बातचीत के संभावित परिणामों पर िवश्लेषण आज के इन-डेप्थ में…
– प्रकाश कुमार रे
बी ते पांच सालों से जारी सीरिया का गृह युद्ध आज एक खास मुकाम पर है. इस महीने के आखिर में कजाखिस्तान के अस्ताना में सीरियाई सरकार और विद्रोहियों के बीच बातचीत की संभावना बन रही है. इस शांति वार्ता की मध्यस्थता रूस और तुर्की कर रहे हैं. रूस ने इस संघर्ष में सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद का साथ दिया है, पर बातचीत के लिए उपयुक्त माहौल बनाने के लिए उसने अपने सैनिकों को वापस बुलाना शुरू कर दिया है. रूसी नौसैनिक पोत एडमिरल कुज्नेत्सोव संघर्ष क्षेत्र से विदाई से इस प्रक्रिया की शुरुआत हुई है. अलेप्पो में विद्रोहियों की हार के बाद हुए युद्ध-विराम समझौते के तहत ये सारी पहलें हो रही हैं. इस समझौते में इसलामिक स्टेट तथा अल-कायदा समर्थित अल-नुसरा और उसके सहयोगी संगठन शामिल नहीं हैं.
दिसंबर के आखिरी दिनों में अलेप्पो में जीत के बाद राष्ट्रपति बशर अल-असद बीते पांच सालों में पहली बार कुछ निश्चिंत नजर आ रहे हैं. एक हालिया साक्षात्कार में उन्होंने कहा है कि वे शांति वार्ता में हर मुद्दे पर विचार करने के लिए तैयार हैं. असद का आत्मविश्वास उनकी इस बात से भी झलकता है कि यदि सीरियाई जनता उन्हें सत्ता में नहीं देखना चाहती है, तो वे पद छोड़ने के लिए भी तैयार हैं.
पर वास्तविक स्थिति जटिल भी है. जैसा कि एसोसिएटेड प्रेस के फिलिप इसा ने लिखा है, अलेप्पो की जीत किसी और माहौल में असद के अपराजेय होने का संकेत हो सकता था क्योंकि वे इतने सालों से जारी विद्रोह के सामने डटे हुए हैं. लेकिन हाल के समय में रूस, ईरान और तुर्की के सहयोग के कारण ही उनकी स्थिति मजबूत हुई है. ऐसे में फिलहाल इस मामले में हाशिये पर पड़े अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप के सत्ता संभालने के बाद अमेरिका के साथ ये तीनों शक्तियां सीरिया के भविष्य को तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायेंगी.
दिसंबर में रूस, ईरान और तुर्की ने मास्को में एक बैठक की थी जिसमें कोई सीरियाई प्रतिनिधि नहीं था. ऐसे में इस संकट का घरेलू समाधान होने की जगह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कूटनीतिक पैंतरे की संभावना पूरी है.
असद ने भी कहा है कि रूस और अमेरिका के संबंधों में नरमी आने से सीरिया संकट को सुलझाने में मदद मिलेगी. उधर विद्रोहियों के पक्षधर तुर्की के साथ भी रूस के संबंध सामान्य होने लगे हैं. जानकारों का कहना है कि सीरिया का इस्तेमाल भू-राजनीतिक मंच पर बड़ी वैश्विक और क्षेत्रीय ताकतों की आपसी लेन-देन के लिए हो सकता है. तुर्की की स्थिति भी बहुत दिलचस्प है. उसने शुरू से ही विद्रोहियों की मदद की है. लेकिन सीरियाई कुर्द सैनिकों के बढ़ते प्रभाव ने राष्ट्रपति एर्दोआं को यह समझने के लिए मजबूर कर दिया कि कुर्द राष्ट्रपति असद से ज्यादा बड़ा खतरा हैं. कुर्द लड़ाके न तो असद की सुनते हैं और न ही विद्रोहियों की. तुर्की सरकार की नजर में सीरियाई कुर्द अपने देश में बढ़ते कुर्द उग्रवाद से जुड़े हुए हैं. इसलामिक स्टेट से लड़ने के लिए पांच हजार तुर्की सैनिक सीरिया के भीतर हैं और शांति वार्ता में भागीदारी से उसे अपना प्रभाव बढ़ाने में मदद मिल सकती है.
संयुक्त राष्ट्र भी आठ फरवरी को सीरियाई सरकार और विद्रोहियों के बीच ठप पड़े जेनेवा वार्ता प्रक्रिया को शुरू करने जा रहा है. यूरोपीय देश सीरिया संकट में अलग-थलग पड़े हुए हैं. उनकी आंतरिक मुश्किलों और अमेरिकी नीतियों में अस्थिरता के कारण अभी वे हस्तक्षेप करने की स्थिति में भी नहीं हैं. लेकिन मध्य-पूर्व में ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के राजनीतिक और आर्थिक हितों की जड़ें बहुत गहरी हैं तथा विभिन्न देशों के साथ उनके संबंध भी अच्छे हैं. ईरान की ताकत बढ़ने और सऊदी अरब की तीखी प्रतिक्रिया तथा यमन और लीबिया की अशांति के मद्देनजर बहुत जल्दी हम यूरोपीय देशों की उल्लेखनीय उपस्थिति देख सकते हैं.
अरब की क्षेत्रीय राजनीति भी अहम कारक
बहरहाल, इतना जरूर है कि पांच सालों से अधिक समय से चल रहे सीरियाई गृह युद्ध के सिलसिले में आगामी दिनों में महत्वपूर्ण बदलाव हो सकते हैं. पर, स्थायी शांति की अभी कोई गारंटी नहीं दी सकती है. लेबनान का सशस्त्र गुट हिजबुल्ला भी सीरिया में है. इसे ईरान और बशर अल-असद का समर्थन भी है. यमन में भी ईरान हौदी विद्रोहियों का समर्थन कर रहा है जिनके विरुद्ध सऊदी अरब का बड़ा गंठबंधन लड़ रहा है. रूस के प्रभाव के प्रति अमेरिका और यूरोप के नकारात्मक रवैये में भी बहुत जल्दी कोई अंतर नहीं आनेवाला है. फिर इसलामिक स्टेट और अल-कायदा से जुड़े गिरोहों की सक्रियता शांति वार्ताओं के परिणामों पर निर्भर नहीं करती है.
अगर शांति बहाल भी होती है, तो यह कह पाना बहुत मुश्किल है कि यह कितनों दिनों तक रह पायेगी. लेकिन ऐसी कोशिशों से अगर लाखों शरणार्थियों की वापसी होती है तथा युद्ध से तबाह सीरिया के पुनर्निर्माण का रास्ता खुलता है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए. थोड़े समय की शांति बड़ी ताकतों, सीरियाई सरकार और विद्रोहियों को कुछ सकारात्मक सोच बनाने का अवसर भी दे सकती है.
रूस का प्रभाव अहम
रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन खुद को सीरिया मामले में एक पीसमेकर की भूमिका में पेश करना चाहते हैं. अलेप्पो में उनकी सेना ने लड़ाई के मैदान में कुछ हद तक इसकी भूमिका भी तैयार की है. ‘एसोसिएटेड प्रेस’ की एक रिपोर्ट में इस संबंध में विस्तार से समझाने की कोशिश की गयी है. जानते हैं सीरिया के गृह युद्ध में रूस की भूमिका के बारे में :
1 रूस की निर्णायक भूमिका
सीरिया के राष्ट्रपति बशर असद आज जिस अवस्था में हैं, उसमें रूस की निर्णायक भूमिका रही है. वे अपनी जमीन खो चुके थे, लेकिन मास्को की मदद से मौजूदा युद्ध में उस समय व्यापक बदलाव आया, जब वर्ष 2015 में उसने अपनी वायु सेना भेजी. अलेप्पो के निकट रूस ने वायु सेना का आक्रामक अभियान छेड़ा और युद्ध की दिशा को सरकार के समर्थन में मोड़ते हुए विरोधियों को चारों खाने चित कर दिया.
भूमध्यसागर में एडमिरल कुजनेत्सोव एयरक्राफ्ट कैरियर समेत 30 युद्धक विमानों को तैनात करते हुए नवंबर में इस अभियानकी शुरुआत की गयी थी. सीरिया के तट पर नेवल और वायु बेस बना कर इस अभियान को उसने पहले ही शुरू कर दिया था. हालांकि, रूस अब कुजनेत्साेव को वहां से हटा रहा है.
2 सीरिया में अब किस तरह हस्तक्षेप
करेगा रूस?
हालात स्थिर होने तक सीरिया में रूसी सेना की मौजूदगी रहेगी. टारटस में उसका नेवल बेस है और हमेमीम में मिलिटरी फील्ड है, जहां से ज्यादातर हवाई हमलों को अंजाम दिया जा चुका है. हालांकि, यह कहना मुश्किल है कि सीरिया में उसके कितने सैनिक हैं, लेकिन मीडिया का अनुमान है कि वहां रूस के चार हजार या उससे ज्यादा सैनिक हो सकते हैं.
पुतिन खुद को पीसमेकर का एक हिस्सा बनाने की रणनीति अपना रहे हैं. तुर्की के साथ व्यापक सीज-फायर में मध्यस्थ की भूमिका निभाने के बाद, मास्को के साथ अंकारा और तेहरान अब सरकार और विरोधियों के बीच अस्ताना, कजाखस्तान में 23 जनवरी से शांति वार्ता की शुरुआत करने में मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं. हालांकि, शांति प्रक्रिया की रूप-रेखा अब तक निर्धारित नहीं की जा सकी है, लेकिन बतौर सीज-फायर एग्रीमेंट के गारंटर, रूस इसे कायम रखने पर जोर दे सकता है. विशेषज्ञों का मानना है कि भूमध्यसागर से कुजनेत्सोव की वापसी से ही अहम बदलाव नहीं लाये जा सकते हैं. इसके लिए और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है.
3 आगामी परिदृश्य या युद्ध को कैसे प्रभावित कर सकता है यह?
असद ने अपने इरादे स्पष्ट कर दिये हैं कि वे विरोधियों और इसलामिक स्टेट से वापस सत्ता अपने हाथों में लेना चाहते हैं. सरकार समर्थक ताकतें दमस्कस के आसपास इस अभियान में जुटी हुई हैं. धीमे-धीमे ही सही, लेकिन इस दिशा में कामयाबी भी हासिल हुई है.
इस संबंध में एक बड़ी चुनौती इडलिब होगा, जिस प्रांत पर पूरी तरह से विरोधियों का कब्जा है. इसके एक ओर तुर्की है, जिसने लंबे अरसे तक विद्रोहियों को पनाह देने के अलावा उन्हें हथियार मुहैया कराने का काम किया है. इडलिब के संदर्भ में सरकार को कोई भी कदम उठाने के लिए तुर्की के सहयोग पर निर्भर होना पड़ेगा. इस वर्ष के शुरुआती दौर में अलेप्पो के उत्तरी इलाकों में सरकार के अभियान में रूस एक बड़ा निर्णायक फैक्टर रहा है. ब्रिटेन-आधारित सीरियन ऑब्जर्वेटरी फॉर ह्यूमैन राइट्स मॉनीटरिंग ग्रुप के मुताबिक, रूस के हवाई हमलों में 4,700 नागरिक और 6,000 विरोधी लड़ाके व इसलामिक स्टेट मिलिटेंट मारे जा चुके हैं.
4 क्या रूस के पास इस क्षेत्र के लिए कोई
दूसरी योजना है?
रूस के लिए मध्यपूर्व में सीरिया एक ऐसा ठिकाना है, जिसने पूर्व सोवियत संघ को इस इलाके में एकमात्र मिलिटरी बेस मुहैया कराया. हालांकि, रूस खुद सैन्य शक्ति के प्रदर्शन में जुटा रहा है, लिहाजा उसके दीर्घकालीन लक्ष्य स्पष्ट नहीं हैं. इजराइल-फिलीस्तीन संघर्ष में भी रूस ने मध्यस्थ बनने की कोशिश की है. अक्तूबर में उसने मिस्र के साथ संयुक्त सैन्य अभ्यास किया, जो अफ्रीकी महादेश में पहली बार हुआ. मास्को के एक विशेषज्ञ व्याचेस्लाव मतुजोव का कहना है कि रूस सीरिया में अपनी मौजूदगी को बढ़ावा देगा. प्रस्तति
– कन्हैया झा

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