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मां की ममता के आगे सब कुछ है फीका

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अपने बच्चों के चेहरे पर मुस्कुराहट के लिए सब कुछ दाव पर लगा देती है मां

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सूरज गुप्ता, कटिहार. समाज व परिवार में मां के महत्व एवं उनकी ममता को शब्दों में बयां नहीं की जा सकती है. रविवार को मदर्स डे है. ऐसे में अभी से सोशल मीडिया के जरिये अलग-अलग संदेश आने लगे है. साथ ही मदर्स डे के अवसर पर खासकर शहरी क्षेत्र में मां के महत्व को रेखांकित करने के लिए कार्यक्रम भी होते रहे है. माना जा रहा है कि रविवार को भी मदर्स डे के अवसर पर अलग अलग गतिविधियों के जरिये मां की ममता व उनके महत्व को रेखांकित किया जायेगा. पिछले कुछ वर्षों से मदर्स डे मनाने की परंपरा जोर पकड़ी है. पर यह सोचना भी जरूरी है कि सिर्फ मदर्स डे पर मां को याद करना ही काफी नहीं है. मां तो मां होती है. यह सभी जानते है. पर उनके लिए भी समाज व परिवार का दायित्व है. स्वस्थ मां ही एक स्वस्थ बच्चे को जन्म दे सकती है. स्वस्थ बच्चे से ही स्वस्थ समाज व राष्ट्र बन सकता है. इस अवधारणा को सार्थक बनाने की जरूरत है. पर मां व बच्चे को लेकर समाज की जो मौजूदा हालत है. वह काफी चिंताजनक है. यह सर्वविदित है कि मातृत्व सुख से बड़ा एक महिला के लिए कुछ नहीं होता है. इस मातृत्व सुख को और भी खुशनुमा बनाने के लिए परिवार के अन्य सदस्यों का सहयोग जरूरी है. खासकर मां को अपने स्वास्थ्य को लेकर जूझना पड़ता है. कई ऐसे अध्ययन रिपोर्ट बताते हैं कि अधिकांश महिलाओं में खून की कमी है. उन्हें पोषकयुक्त आहार नहीं मिलता है. जिससे मां के साथ साथ उनके बच्चे भी कुपोषित हो जाते है.

61 प्रतिशत माताओं में खून की कमी

भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे पांच की रिपोर्ट पर भरोसा करें तो कटिहार जिले में 15-49 आयु वर्ग समूह की 61.0 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया से पीड़ित है. चार-पांच साल पहले 57.8 प्रतिशत गर्भवती महिलाएं एनीमिया से ग्रसित थे. यह इस बात की ओर इशारा करता है कि पीढ़ी दर पीढ़ी कुपोषण चक्र बना हुआ है. इस रिपोर्ट के अनुसार बिहार में केवल 16.2 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं ने गर्भावस्था के दौरान सौ दिनों या उससे अधिक दिनों तक आयरन और फोलिक एसिड की दवा का सेवन किया. बहरहाल तमाम समस्याओं व परेशानियों को झेलते हुए मां अपने बच्चे को हमेशा ही खुशहाल व सुखी देखना चाहती है. प्रभात खबर ने मदर्स डे पर कई महिलाओं से बात की, जो विभिन्न समस्याओं से जूझते हुए अपने बच्चे की बेहतर परवरिश की है.

केस स्टडी 01, मेहनत-मजदूरी कर बच्चों को पढ़ाया

शहर के नया टोला के निवासी स्वर्गीय गंगा की धर्मपत्नी शांति देवी गरीबी के कारण नहर पर किसी तरह झोपड़ी बनाकर गुजर बसर करती है. आठ सदस्यों वाली परिवार में केवल वह मजदूरी का काम करती थी. चार लड़की व दो लड़कों का भार होने से जहां गरीबी जीवन काटने को विवश थी. वहीं दूसरी मजदूरी के नाम पर दो रुपया प्रतिघंटा पारिश्रमिक मिलता था. दिन भर कड़ी मेहनत करने के बाद जो मजदूरी मिलती थी. उससे परिवार का भरण पोषण करती थी. साथ ही बच्चों की पढ़ाई लिखाई भी उनके लिए चुनौती थी. पर कभी हिम्मत नहीं हारी. हमेशा कठिन परिश्रम करके जो पारिश्रमिक मिलता था. उससे घर के भरण-पोषण के साथ-साथ बच्चों की पढ़ाई में खर्च करती थी. यही वजह है कि वह अपने बच्चों को पढ़ा लिखा सका साथ ही अपने मेहनत मजदूरी के बल पर वह अपनी बेटियों को अच्छे घर में शादी भी करा सकी. बातचीत में शांति देवी ने कहा कि बच्चों के चेहरे पर मुस्कान ही उनके लिए सब कुछ है. इसके लिए जितनी भी मेहनत करनी पड़ी. उसमें कभी पीछे नहीं रहे.

केस 02, महिलाओं के लिए मातृत्व से बड़ा कोई सुख नहीं

पहली बार मां का सुख क्या होता है. यह कोई मां ही बता सकती है. मातृत्व से बड़ा कोई सुख नहीं होता है. शहर के बिनोदपुर में अपने बच्चे को शिशु रोग विशेषज्ञ से दिखाने पहुंची पररिया की प्रियंका कुमारी गुड़िया ने यह उदगार प्रभात खबर के साथ बातचीत में व्यक्त किया. वह कहती है कि जब मां बनने की खुशी घर में लोगों को पता चला तो परिवार के सभी सदस्य खुशी से झूम उठे. मेरी खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं था. सचमुच मां बनना काफी सुखमय होता है. इसमें अगर कोई परेशानी भी होती है तो उसका पता भी नहीं चलता है. हालांकि उनके साथ ऐसा नहीं हुआ. परिवार के सभी सदस्यों का भरपूर सहयोग मिला और सब कुछ ठीक-ठाक से रहा. बच्चे भी काफी स्वस्थ है. सभी परिवार के सदस्यों को जच्चा बच्चा का ख्याल रखना चाहिए. यह बहुत जरूरी है.

ऐसे हुई मदर्स डे मनाने की शुरुआत

भारत समेत कई देशों में हर साल मई के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है. इस साल भारत में 12 मई यानी इस महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जायेगा. दुनियाभर में मां के प्रति अपना सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए मदर्स डे को सेलिब्रेट किया जाता है. जानकारों की मानें तो दरअसल मदर्स डे मनाने की शुरुआत अमेरिकन महिला एना जॉर्विस ने की थी. हालांकि मदर्स डे मनाने की औपचारिक शुरुआत से नौ मई 1914 को अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुड्रो विल्सन ने की थी. उस समय अमेरिकी संसद में कानून पास करके हर साल मई महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाने का फैसला लिया गया था. तब से अमेरिका, यूरोप और भारत सहित कई देशों में मई महीने के दूसरे रविवार को मदर्स डे मनाया जाता है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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