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Madrasa In India: कैसे दी जाती है मदरसों में शिक्षा, बाल अधिकार आयोग ने क्यों उठाए सवाल?

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Madrasa In India : मार्च महीने में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए मदरसा शिक्षा बोर्ड अधिनियम, 2004 को असंवैधानिक करार दिया था और मान्यता प्राप्त मदरसा छात्रों को नियमित स्कूलों अविलंब भेजने का निर्देश दिया था. इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में कई अपील दाखिल की गई, जिसपर सुनवाई के दौरान 11 सितंबर को राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में मदरसा शिक्षा पर सवाल उठाए और इसे राइट टू एजुकेशन के खिलाफ भी बताया. इस आलेख में इस बात पर फोकस किया गया है कि मदरसों में क्या और कैसी शिक्षा दी जाती है

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Madrasa In India : राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में 11 सितंबर को यह कहा है कि मदरसों में दी जाने वाली शिक्षा संपूर्ण है नहीं है, साथ ही यह शिक्षा का अधिकार अधिनियम 2009 के प्रावधानों के अनुसार भी नहीं है. बाल अधिकार आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि यहां पढ़ाई जाने वाली किताबों में इस्लाम की सर्वोच्चता की बात पढ़ाई जाती है. आयोग ने यह तर्क भी दिया है कि बच्चों को उचित और अच्छी शिक्षा देने के लिए यह जगह सही नहीं है और एनसीईआरटी की कुछ किताबें पढ़ाना केवल दिखावा है और इनसे यह सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है कि बच्चों को क्वालिटी एजुकेशन मिल रहा है. राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग बच्चों के अधिकारों के लिए गठित देश की सर्वोच्च संस्था है इसलिए सुप्रीम कोर्ट में आयोग द्वारा दी गई इस जानकारी के बाद मदरसों के एजुकेशन सिस्टम पर सवाल खड़े हो गए हैं?

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क्या है मदरसा?

भारत में मदरसों का इतिहास काफी पुराना है, पहला मदरसा कब और कहां खोला गया, इसपर कई विचार हैं. कहा जाता है कि सबसे बड़ा और पहला मदरसा दारुल उलूम देवबंद उत्तरप्रदेश में खुला. यह भी एक तर्क है कि ब्रिटिश काल में दुभाषिया बनाने के लिए मदरसा खोला गया. मदरसा दरअसल इस्लामिक तरीके से पढ़ाई करवाने वाले स्कूल या शिक्षण संस्थान को कहा जाता है. भारत में मदरसे दो तरह के हैं-1. जो सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त हैं और 2. जो निजी खर्चों यानी चंदे से चलाए जाते हैं. शुरुआत में मदरसों में सिर्फ धार्मिक पढ़ाई ही होती थी और यहां से पढ़कर निकलने वाले बच्चे हाफिज, मुंशी, मौलवी और मुफ्ती बनते थे, लेकिन समय के साथ मदरसे की शिक्षा व्यवस्था में बदलाव हुआ और अब सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त मदरसों में धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ अन्य विषयों और भाषाओं मसलन हिंदी, अंग्रेजी, साइंस, सोशल साइंस और मैथ्स की पढ़ाई भी होती है. भारत में सबसे अधिक मदरसे उत्तर प्रदेश में हैं. 2020 में केंद्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी ने संसद को बताया था कि 2018-19 तक, भारत में 24,010 मदरसे थे, जिनमें से 19,132 मान्यता प्राप्त मदरसे थे और शेष 4,878 गैर-मान्यता प्राप्त थे.


मदरसों में कैसी है शिक्षा व्यवस्था?

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मदरसा इस्लामिया, रांची झारखंड के रिटायर्ड प्रिंसिपल रिजवान बताते हैं कि झारखंड में दो तरह के मदरसे हैं, एक जो गवर्नमेंट एडेड हैं और दूसरे जो निजी पैसों या चंदे से चलते हैं. झारखंड में 186 मदरसे सरकारी सहायता से चलते हैं और 592 चंदों से चलते हैं. सरकारी सहायता से चलने वाले मदरसों में सिलेबस का पूरा ध्यान रखा जाता है और एनसीईआरटी की किताबों से पढ़ाई कराई जाती है, जबकि निजी पैसों से चलने वाले मदरसों में धार्मिक पढ़ाई पर ज्यादा जोर दिया जाता है. झारखंड के मदरसों की परीक्षाएं झारखंड एकेडेमिक कौंसिल द्वारा ली जाती हैं, क्योंकि यहां मदरसा बोर्ड नहीं है. मदरसा बोर्ड नहीं होने की वजह से छात्रों को बहुत परेशानी होती है. अगर कोई काम हो तो उसे दुरुस्त करवाने में बहुत मुश्किल होती है. कौंसिल समय पर परीक्षाएं आयोजित नहीं कर पाता है और रिजल्ट में भी देरी होती है, इससे छात्र-छात्राओं को एडमिशन मिलने में दिक्कत होती है. झारखंड में विभन्न विषयों की पढ़ाई अंग्रेजी और हिंदी माध्यम से ही होती है, क्योंकि उर्दू और अरबी में अन्य विषयों की किताबें उपलब्ध नहीं हैं. छात्र-छात्राएं एक साथ ही पढ़ते हैं क्योंकि टीचर्स की कमी है, लेकिन बच्चियां पर्दे में आती हैं और उन्हें बच्चों से अलग बैठाया जाता है.

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उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड के सदस्य और मदरसा संचालक जामा बताते हैं कि मदरसों में एनसीईआरटी की तर्ज पर ही पढ़ाई होती है. क्लास एक से आठ तक सभी विषयों की पढ़ाई होती है और इस पढ़ाई का माध्यम हिंदी और अंग्रेजी ही होता है, क्योंकि इसी भाषा में टेक्सट बुक मौजूद हैं. उसके बाद जो आगे की पढ़ाई करते हैं उनके लिए हिंदी और अंग्रेजी जरूरी विषय है, उसके अलावा जो वो पढ़ना चाहते हैं पढ़ते हैं. उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक मदरसे हैं, जिसका उद्देश्य अरबी और फारसी भाषा को बचाकर रखना और उसका प्रसार करना था. 1908 में उसी उद्देश्य से मदरसों की स्थापना हुई और संस्कृत बोर्ड भी बना, जिसका उद्देश्य संस्कृत भाषा का प्रसार था.


यूपी मदरसा बोर्ड के रजिस्ट्रार आरपी सिंह ने प्रभात खबर को बताया कि प्रदेश में मदरसों के मार्डनाइजेशन के लिए 2001 से ही काम हो रहा है. काफी काम हुआ है. प्रदेश में कक्षा एक से आठ तक के बच्चों को एनसीईआरटी की तर्ज पर शिक्षा दी जा रही है. बच्चे और बच्चियों को आठवीं तक एक साथ शिक्षा दी जाती है और उसके बाद मिक्स पढ़ाई होती है. कोशिश की जा रही है कि बच्चों को अच्छी शिक्षा मिले.


यूपी मदरसा बोर्ड के पूर्व चेयरमैन जावेद का कहना है कि हमारे प्रदेश में 14 करोड़ रुपए मदरसों पर खर्च किए जा रहे हैं. अच्छी शिक्षा दी जा रही है. हम एनसीईआरटी की तर्ज पर शिक्षा देते हैं, इसलिए यह इल्जाम गलत है कि यहां राइट टू एजुकेशन के तहत शिक्षा नहीं दी जाती है.


कैसे मिलती है मदरसों में डिग्री?

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मदरसों में पढ़ने वाले बच्चों के उनकी पढ़ाई के अनुसार डिग्री दी जाती है. चूंकि अरबी और फारसी भाषा का बहुत ही सुंदर उदाहरण कुरान और हदीस में देखने को मिलता है इसलिए इनकी पढ़ाई यहां विशेष तौर पर होती है.

  • कक्षा 1-5 तक पढ़ने वाला-तहतानिया (प्राइमरी बोर्ड)
  • कक्षा 6-8 तक पढ़ने वाला-फोकानिया
  • कक्षा दसवीं तक पढ़ने वाला-मुंशी और मौलवी(जो फारसी पढ़ता है वो मुंशी और जो अरबी पढ़ता है वो मौलवी)
  • कक्षा 12वीं तक पढ़ने वाला-आलिम
  • बीए तक पढ़ने वाला-फाजिल

क्या कहते हैं धर्मगुरु

दिल्ली के इमाम साजिद राशिदी का कहना है कि देश में कोई सेंट्रल मदरसा बोर्ड नहीं हैं. राज्यों के अपने बोर्ड हैं. जहां तक बात मुसलमान बच्चों की है तो 96 प्रतिशत मुसलमान बच्चे आम स्कूलों और काॅलेजों में पढ़ते हैं. सिर्फ चार प्रतिशत बच्चे मदरसों में जाते हैं जो हमारी जरूरत हैं. अगर वे धार्मिक पढ़ाई नहीं करेंगे तो मौलवी कौन बनेगा, मुफ्ती कौन बनेगा. हमें इन बच्चों को इस्लामिक पढ़ाई करवाना जरूरी है. दिल्ली में कोई मदरसा बोर्ड नहीं है, ज्यादातर मदरसे निजी चंदे से चलते हैं. जहां तक बात स्कूली शिक्षा की है, तो बच्चा धार्मिक शिक्षा के अतिरिक्त भी शिक्षा पाना चाहता है वो ओपन स्कूल के जरिए इसे पूरा करता है. किसी को कोई दिक्कत नहीं है. जो बच्चे सामान्य स्कूलों में जाते हैं, उनके मां-बाप भी उन्हें अरबी-फारसी सिखाने के लिए मौलवियों के जरिए ट्‌यूशन दिलाते हैं.


रांची के मौलाना तहजीब कहते हैं कि मदरसों का इतिहास बहुत पुराना है. मैंने भी मदरसे में पढ़ाई की है और देश के कई हिस्सों के मदरसे घूम चुका हूं. मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि आज मदरसों में काफी बदलाव आ गया है. जो मदरसे निजी खर्चे से चलते हैं वहां पहले सिर्फ और सिर्फ धार्मिक पढ़ाई होती थी, लेकिन आज वहां गणित, अंग्रेजी और कंप्यूटर जैसे विषय भी पढ़ाए जा रहे हैं. बच्चों को नैतिक शिक्षा और देश प्रेम की शिक्षा भी दी जाती है, इसलिए यह कहना कि मदरसों में गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा नहीं दी जाती है, ये सही नहीं है.

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क्या है मदरसा?

मदरसा स्कूल को कहा जाता है, जहां अरबी और फारसी भाषा की पढ़ाई होती है और इस्लामिक तरीके से धर्म की शिक्षा दी जाती है. मदरसा अरबी भाषा का शब्द है.

भारत में सबसे ज्यादा मदरसे कहां हैं?

भारत में सबसे ज्यादा मदरसे उत्तर प्रदेश में हैं.

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