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असली अमेरिकी चेहरे को बेनकाब करता चुनाव

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US Election 2024 : अमेरिकी चुनाव को देखने के तीन नजरिये हो सकते हैं. पहला, बाकी दुनिया की तरह हम उत्सुकता से परिणाम का अनुमान लगा सकते हैं, मानो यह इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया का टेस्ट मैच हो. अमेरिकी राजनीति के विद्वानों की राय मानें, तो इस बार कांटे की टक्कर है.

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US Election 2024 : विश्लेषण से पहले कबीरदास से क्षमायाचना करते हुए एक तुकबंदी पेश है- ‘कमला ट्रंप दोऊ खड़े, काके करूं सखाय/ बलिहारी ट्रंप आपनो, जिन अमेरिका दियो दिखाय.’ कवि कहता है कि मेरे सम्मुख डोनाल्ड ट्रंप और कमला हैरिस दोनों खड़े हैं, और इस नाचीज हिंदुस्तानी की दुविधा है कि किससे दोस्ती करूं. फिर उसके समक्ष सत्य का प्रकाश होता है और वह कह उठता है- जय हो ट्रंप साहब की, जिन्होंने पूरी दुनिया को अमेरिका का सच्चा चेहरा दिखा दिया.

अमेरिकी चुनाव को देखने के तीन नजरिये हो सकते हैं. पहला, बाकी दुनिया की तरह हम उत्सुकता से परिणाम का अनुमान लगा सकते हैं, मानो यह इंग्लैंड और ऑस्ट्रेलिया का टेस्ट मैच हो. अमेरिकी राजनीति के विद्वानों की राय मानें, तो इस बार कांटे की टक्कर है. रिपब्लिकन पार्टी की तरफ से दूसरी बार राष्ट्रपति चुने जाने के दावेदार ट्रंप और डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से निवर्तमान उपराष्ट्रपति और पहली बार राष्ट्रपति चुनाव में उतरी हैरिस दोनों को लगभग बराबर वोट आने की संभावना है, कोई 45 प्रतिशत के आसपास.

अनुमान है कि वोटों में हैरिस दो-तीन प्रतिशत आगे रह सकती हैं. लेकिन अमेरिकी चुनाव पद्धति इतनी अजीब है कि अधिक वोट आने के बावजूद कमला हैरिस के हारने की संभावना ज्यादा है. दूसरा नजरिया एक चिंतित विश्व नागरिक का होगा. हम चिंता कर सकते हैं कि ट्रंप जैसे खड़ दिमाग का सबसे ताकतवर देश का राष्ट्रपति बनने का दुनिया पर क्या असर पड़ेगा. सच यह भी है कि हमारी चिंता करने से कुछ होने-जाने वाला नहीं है. यूं भी, कोई अमेरिकी राष्ट्रपति बने, हमारे जैसे देशों के लिए कोई खास फर्क पड़ने वाला नहीं है.


तीसरा नजरिया हो सकता है- एक ठेठ हिंदुस्तानी नजरिया. बेगाने की शादी में अब्दुल्ला दीवाना बनने के बजाय हम दूर से इस चुनाव को देखें और सीखें. चुनावी घमासान के चलते अचानक अमेरिकी सपने का सुनहरा पर्दा गिर गया है. उसका फायदा उठाकर दुनिया को लोकतंत्र का उपदेश देने वाली जन्नत की हकीकत देखने का मौका ना छोड़ें. इस नजर से देखने पर हमें सबसे आगे डोनाल्ड ट्रंप नामक महाशय मिलेंगे, जिनके साथ आधा अमेरिका खड़ा है, आधे से ज्यादा श्वेत और मर्द मतदाता खड़े हैं, ऐलन मस्क जैसे रईस खड़े हैं. कोई ऐसा कुकर्म नहीं है, जिससे इन्हें परहेज रहा हो.

ट्रंप ने रियल एस्टेट और बिल्डर के काम से 660 करोड़ डॉलर (लगभग 55,000 करोड़ रुपये) का साम्राज्य बनाया है, टैक्स फ्रॉड में पकड़े जा चुके हैं. झूठ और नफरत का धंधा भी खुलकर चलाते हैं. अप्रवासियों के बारे में अफवाह फैलाते हैं. ट्रंप सच और झूठ के बीच कोई भेद नहीं करते. वहां का मीडिया उनके झूठ को झूठ बताने में कोताही नहीं करता. ट्रंप औरतों के मामले में बदनाम हैं, तीन बार शादी की है, दर्जनों अफेयर रहे हैं, औरतों के बारे में अश्लील टिप्पणियां भी करते रहे हैं. उनके साथ काम करने वाले अनगिनत लोग उनकी बेईमानी, बदमजगी, बेवकूफी, बदतमीजी और बेहयाई की शिकायत कर उनका साथ छोड़ चुके हैं. पिछली बार चुनाव हारने के बाद ट्रंप साहब ने अपने समर्थकों को संसद भवन पर हमला करने के लिए उकसाया और अमेरिकी इतिहास में पहली बार तख्ता पलटने की कोशिश करवायी.


आप सोचेंगे कि ऐसी छवि वाला व्यक्ति सार्वजनिक जीवन में बचा कैसे है. यह सवाल आपको मंच के दूसरी तरफ ले जायेगा, जहां एक बुजुर्ग जो बाइडेन मिलेंगे. खोये-खोये से लड़खड़ाते हुए यह सज्जन अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और दुनिया की सबसे ताक़तवर फौज के कमांडर हैं. कुछ महीने पहले तक वे डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार भी थे. वो तो भला हो एक टीवी डिबेट का, जिसमें ट्रंप से बहस करते हुए उनकी मानसिक अवस्था की कलई खुल गयी और उनके समर्थकों को उन्हें बीच रास्ते दौड़ से बाहर निकालना पड़ा.

अब ट्रंप का मुकाबला कर रही हैं कमला देवी हैरिस. भारतीय मूल की तमिल माता और जमैका के अश्वेत पिता की संतान कमला एक अश्वेत महिला हैं, पढ़ी लिखी हैं, स्वस्थ हैं और बोलने में चुस्त. उनकी पृष्ठभूमि से आप यह ना समझ लें कि उन्हें भारत या तीसरी दुनिया के अश्वेत लोगों से कोई हमदर्दी है. इस मायने में वे अमेरिकी मुख्यधारा की राजनीति की प्रवक्ता हैं. वे इस्राइल की समर्थक हैं, दुनिया में अमेरिकी दादागिरी की वकालत करती हैं और देश के भीतर थैलीशाहों के साथ हैं. उन पर कोई बड़ा आरोप नहीं है- न कुछ बुरा करने का, न कुछ अच्छा करने का, न बुरा बोलने का, न अच्छा सोचने का. तमाम बड़े नेताओं की तरह वे भी विचार मुक्त हैं. यह है विकल्प अमेरिकी जनता के सामने.


अगर आप दुनिया के हाशिये पर बैठकर देखेंगे, तो आप समझेंगे कि असली सवाल यह नहीं है कि कौन जीतेगा. सवाल यह है कि अमेरिकी चुनाव इन विकल्पों तक क्यों सिमट गया है. क्या उस समाज का रातोंरात ऐसा पतन हो गया है या हमें अचानक उसका पूरा सच देखने का मौका मिल गया है? क्या ट्रंप एक औसत अमेरिकी की दबी कुंठाओं और अमेरिकी चरित्र की अभिव्यक्ति हैं? या दुनियाभर में अब महामानव नेताओं से पिंड छुड़ाकर औसत की पूजा का युग शुरू हो गया है? जैसा अरस्तू का डर था- क्या लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल रहा है?
(ये लेखक के निजी विचार हैं.)

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