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नयी ब्रिटिश सरकार व भारत से संबंध

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जीडीपी के मामले में भारत हाल में ब्रिटेन से आगे निकल गया है, इसलिए ब्रिटेन भारत के साथ व्यापार समझौते को सुनहरे मौके के रूप में देखता है. ब्रिटेन को उम्मीद है कि अगर समझौता होता है, तो भारत ब्रिटेन की ग्रीन टेक्नोलॉजी और ब्रितानी सेवाओं का बड़ा खरीदार बनेगा.

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ब्रिटेन में काफी समय से राजनीतिक उठापटक का दौर जारी है और इससे ब्रिटिश विदेश नीति भी प्रभावित हो रही है. ब्रेक्जिट के बाद से अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में जुटे ब्रिटेन की राजनीतिक व आर्थिक चुनौतियों को इच्छाशक्ति और सही सोच से निपटा जा सकता है. अभी ब्रिटेन में इसकी कमी देखी जा रही है. नयी सरकार के गठन के महज 38 दिन बाद वित्त मंत्री को बर्खास्त कर दिया गया है.

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प्रधानमंत्री लिज ट्रस से पत्रकारों ने पूछा कि अगर उन्हें अपने ही पसंद के वित्त मंत्री को टैक्स कटौती के मामले में हटाना पड़ रहा है, तो वे अपने को इस पद के लिए कितना उपयुक्त मानती हैं. सवालों के जवाब में ट्रस ने ब्रिटिश जनता को महंगाई से उबारने और बेहतर ब्रिटेन बनाने की बात की. समस्या सिर्फ वित्त मंत्रालय तक सीमित नहीं है. लिज की दूसरी पसंदीदा मंत्री मौजूदा गृहमंत्री सुएला ब्रेवरमैन के बयानों ने भारत और ब्रिटेन के बीच होने वाले मुक्त व्यापार समझौते पर संकट खड़ा कर दिया है.

ब्रेवरमैन भारतीय मूल की हैं, लेकिन एक हालिया इंटरव्यू में वह साफ तौर पर भारत के विरोध में खड़ी दिखीं. उन्होंने कहा, ‘मुझे भारत के साथ खुली सीमा की नीति को लेकर चिंताएं हैं, क्योंकि मुझे लगता है कि लोगों ने जब ब्रेक्जिट को चुना था, तब इसलिए वोट नहीं किया था.’ सुएला ने यह भी कहा कि वीजा समाप्त होने के बाद ब्रिटेन में सबसे ज्यादा भारतीय प्रवासी ही रहते हैं. ब्रिटेन में भारत के उच्चायोग ने इस दावे पर तुरंत आपत्ति व्यक्त की और इसे बेबुनियाद बताया.

जनवरी, 2022 में दोनों देशों के बीच दिल्ली में मुक्त व्यापार समझौते के लिए बातचीत शुरु हुई थी, पर इसकी बुनियाद 2021 में लिज ट्रस ने ही रखी थी, जब वे बतौर अंतरराष्ट्रीय व्यापार मंत्री भारत आयी थीं. बतौर विदेश मंत्री भी ट्रस ने इसी साल अप्रैल में भारत का दौरा किया था और कहा था कि वे समझौते को लेकर पूरी तरह आश्वस्त हैं. इसी साल भारत आये तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने भी कहा था कि वे मुक्त व्यापार समझौते को लेकर प्रतिबद्ध हैं और उम्मीद जतायी थी कि दीपावली तक इस पर हस्ताक्षर हो जायेंगे.

जब ब्रिटेन में कंजर्वेटिव पार्टी के सांसदों के बीच प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनने की होड़ थी, तब भी लिज ट्रस ने जोर देकर कहा था कि दीपावली तक समझौता हो जायेगा. इस समझौते से 2035 तक दोनों देशों के बीच सालाना कारोबार 28 अरब पाउंड तक बढ़ जायेगा. साल 2021 में दोनों देशों के बीच 24 अरब पाउंड का कारोबार हुआ था.

ये जानना इसलिए जरूरी था, क्योंकि अब लिज ट्रस भारतवंशी ऋषि सुनक को मात देकर प्रधानमंत्री हैं और जिस गृह मंत्री ने लिज के लिए अपने बयानों से मुश्किलें पैदा की हैं, वह खुद भारतीय मूल की हैं. ब्रेवरमैन का बयान प्रधानमंत्री ट्रस के रुख से बिल्कुल अलग है. निश्चित ही इस समझौते से दोनों देशों को फायदा होगा, लेकिन यह भी एक कड़वा सच है कि अभी इस समझौते की ब्रिटेन को ज्यादा जरूरत है और भारत बेहतर स्थिति में है.

ब्रिटेन में महंगाई पिछले चार दशक में सबसे ज्यादा है और रूस-यूक्रेन युद्ध के दुष्परिणामों का असर यूरोप के अन्य देशों के साथ-साथ ब्रिटेन पर भी पड़ रहा है. दूसरी तरफ भारत के पास इस समय व्यापार भागीदारों की कोई कमी नहीं है. इसी साल भारत ने संयुक्त अरब अमीरात व ऑस्ट्रेलिया के साथ व्यापार समझौते किये है. भारत ने यूरोपीय संघ के साथ भी कारोबारी मझौते के लिए बातचीत शुरू कर दी है.

प्रधानमंत्री लिज ट्रस के पास फिलहाल राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी है क्योंकि कड़े फैसले के लिए सरकार के पास जो क्षमता होनी चाहिए, वह इस समय उनके पास नहीं है. ब्रिटिश गृहमंत्री के बयान को ठीक से समझें और उनके बयान को ब्रिटेन और सरकार का आधिकारिक बयान मानें, तो इसका मतलब साफ है कि भारतीय पेशेवरों ( छात्र और उद्यमी) के ब्रिटेन पहुंचने में कोई खास सुविधा नहीं मिलने वाली है. अगर भारतीय पेशेवरों को लाभ नहीं मिलता, तो भारत के लिए इस व्यापार समझौते का कोई मतलब नहीं रहता.

ट्रस सरकार अगर मजबूत होती, तो गृहमंत्री के बयान से पैदा होने वाले विवाद को सुलझा लेती. महज 38 दिन बाद अपने पसंदीदा वित्त मंत्री को बर्खास्त करने और टैक्स नीतियों पर यू टर्न लेने यह साफ है ट्रस राजनीतिक रूप से बहुत कमजोर हैं. वैसे भी सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी के एक बड़े धड़े के लिए प्रवासियों का मुद्दा बड़ा राजनीतिक मुद्दा है और इस पर पार्टी के अंदर कोई आम सहमति नहीं बन पायी है.

प्रधानमंत्री ट्रस का नेतृत्व इतना सशक्त नहीं है कि वह कोई आम सहमति बना सके. साफ है कि ब्रिटेन की अंदरूनी राजनीति की वजह से उसकी विदेश नीति प्रभावित हो रही है. लेबर मोबिलिटी (पेशेवर लोगों का आना-जाना) अगर व्यापार समझौते का हिस्सा नहीं बनती है, तो भारत के लिए इस पूरे समझौते का कोई अर्थ नहीं रह जायेगा. भारत चाहता है कि भारतीयों के पास ब्रिटेन में काम करने और वहां रहने के अधिक से अधिक अवसर हों. ब्रिटेन के साथ किसी भी तरह के कारोबारी समझौते में भारत की प्राथमिकता भारतीय छात्रों और पेशेवरों के लिए वीजा नियमों में राहत हासिल करना ही है. उधर भारत के साथ कारोबारी समझौता करना ब्रिटेन सरकार की सबसे महत्वाकांक्षी नीतियों में से एक है.

भारत 2050 तक दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है. जीडीपी के मामले में भारत हाल में ब्रिटेन से आगे निकल गया है, इसलिए ब्रिटेन भारत के साथ व्यापार समझौते को सुनहरे मौके के रूप में देखता है. ब्रिटेन चाहता है कि भारत ब्रिटेन से व्हिस्की जैसे उत्पादों की खरीद बढ़ाए. ब्रिटेन को उम्मीद है कि अगर समझौता होता है, तो भारत ब्रिटेन की ग्रीन टेक्नोलॉजी और ब्रितानी सेवाओं का बड़ा खरीदार बनेगा.

बैंकिंग और कानूनी सेवा के क्षेत्र में भी ब्रिटेन को बहुत उम्मीदें हैं, लेकिन इन सबके भविष्य पर फिलहाल सुएला ब्रेवरमैन के बयानों का साया है. कोई आश्चर्य नहीं होगा, अगर लिज ट्रस आने वाले दिनों में इस समझौते के पक्ष में फिर यह बयान देती नजर आएं, क्योंकि दोनों देशों के कूटनीतिकों ने ये संकेत दिये हैं कि भले ही यह समझौता दीपावली की समय सीमा तक नहीं होता दिख रहा है, लेकिन नवंबर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की संभावित ब्रिटेन यात्रा के वक्त इसे अमली जामा पहनाया जा सकता है.

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