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राजनीतिक बिसात पर एमबीसी

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नवीन जोशी वरिष्ठ पत्रकार naveengjoshi@gmail.com दलित और पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ वास्तव में कितना मिला और किसे-किसे, यह शुरू से विवाद का विषय रहा है. कालांतर में यह तथ्य सामने आता गया कि दलितों-पिछड़ों में कुछ गिनी-चुनी, करीब एक तिहाई जातियों को ही आरक्षण का सर्वाधिक लाभ मिला. आरक्षित श्रेणी की बाकी दो […]

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नवीन जोशी
वरिष्ठ पत्रकार
naveengjoshi@gmail.com
दलित और पिछड़ी जातियों को आरक्षण का लाभ वास्तव में कितना मिला और किसे-किसे, यह शुरू से विवाद का विषय रहा है. कालांतर में यह तथ्य सामने आता गया कि दलितों-पिछड़ों में कुछ गिनी-चुनी, करीब एक तिहाई जातियों को ही आरक्षण का सर्वाधिक लाभ मिला.
आरक्षित श्रेणी की बाकी दो तिहाई जातियों के लोग वंचित ही रहे या बहुत कम लाभ पा सके. इस असंतुलन ने दलितों में भी दलित यानी ‘महादलित’ और पिछड़ों में अत्यधिक पिछड़ी जातियों ने मिलकर एक नया वर्ग (एमबीसी) बना दिया. चूंकि जाति हमारे देश में राजनीति के केंद्र में रही, इसलिए आरक्षण के असंतुलित लाभ ने पिछड़ों-दलितों में नयी राजनीतिक हलचल को जन्म दिया. यह हलचल बढ़ते-बढ़ते आज देश की चुनावी राजनीति पर पूरी तरह छा गयी है.
मुद्दे के दो पहलू हैं. एक तो यह मांग कि आरक्षण की व्यवस्था का सम्यक विवेचन और संशोधन होना चाहिए, ताकि वंचित वर्गों को सामाजिक-आर्थिक मोर्चे पर आगे बढ़ने का मौका मिले.
सिर्फ कुछ शहरी पढ़े-लिखे वर्ग तथा गांवों में ताकतवर जातियां ही लाभ उठाती रहेंगी, तो आरक्षण देने का उद्देश्य अधूरा रह जाता है. इससे पैदा हुआ वंचित वर्ग का आक्रोश समझ में आता है, लेकिन जब गुजरात के पाटीदार, हरियाणा एवं यूपी के जाट और महाराष्ट्र के मराठा जैसे समर्थ और संपन्न वर्ग भी आरक्षण के लिए आंदोलित होते हैं, तो आरक्षण के अपने मूल ध्येय से भटक जाने के कटु सत्य से हमारा सामना होता है.
दूसरा पहलू चुनावी लाभ के लिए आरक्षण को राजनीतिक चाल की तरह इस्तेमाल करना है. दुर्भाग्य से यही पहलू सर्वोपरि हो गया है. इसलिए आरक्षण व्यवस्था की ईमानदारी से समीक्षा की बजाय अलग-अलग ढंग से पार्टियों ने इसे अपने हित में भुनाना जारी रखा.
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण का ही उदाहरण लें. मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू होने के बाद 27 फीसदी आरक्षण का सर्वाधिक लाभ लेनेवाले उत्तर प्रदेश तथा बिहार में यादव व कुर्मी या कर्नाटक में वोक्कालिंगा हैं, जो पहले ही शेष पिछड़ी जातियों से कहीं बेहतर स्थिति में थे.
मंडलवाद के समय में समाजवादी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, जनता दल (एस) जैसे जिन दलों की राजनीति चमकी, उन्होंने भी मुख्यत: इन्हीं समर्थ जातियों का प्रतिनिधित्व किया. अपने-अपने राज्यों में ये दल ताकतवर बने. सत्ता पर उनकी पकड़ मजबूत रही. स्वाभाविक ही, ओबीसी आरक्षण का लाभ लेने में पिछड़ गयी दूसरी पिछड़ी जातियों में रोष उठा. उनके नेतृत्व ने या तो इन दलों पर दबाव बनाकर आंशिक लाभ लेने की रणनीति अपनायी या अन्य दलों का दामन थामा.
सीएसडीएस (सेंटर फॉर द स्टडीज ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज) के एक अध्ययन के अनुसार, मंडल रिपोर्ट लागू होने के बाद जिन राज्यों में क्षेत्रीय दल नहीं उभरे यानी जहां कांग्रेस और भाजपा की सीधी टक्कर होती आयी, यथा मध्य प्रदेश, राजस्थान, आदि वहां 2009 तक आरक्षण-लाभ-वंचित पिछड़ी जातियों ने 2009 के चुनावों तक कांग्रेस को तरजीह दी. साल 2014 के आम चुनाव में यह समीकरण बदल गया.
कारण नरेंद्र मोदी का स्वयं पिछड़ी जाति का दांव चलना हो या कांग्रेस से मोहभंग, उपेक्षित पिछड़ी जातियों के मतदाताओं ने भारी संख्या में भाजपा को चुना. बिहार विधानसभा चुनाव में लालू और नीतीश के एक हो जाने से इस प्रवृत्ति पर विराम लगा, लेकिन 2017 में उत्तर प्रदेश के चुनाव में भाजपा एक बार फिर उपेक्षित पिछड़ी एवं दलित जातियों का बड़े पैमाने में समर्थन पाने में कामयाब हुई. बसपा-सपा की भारी हार के कारण इसी तथ्य में निहित थे.
साल 2019 के आम चुनाव में भाजपा यही करिश्मा बनाये रखना चाहती है. उसने एमबीसी तथा उपेक्षित दलित जातियों का समर्थन पाने की हर जुगत बैठाने की कोशिश जारी रखी. मोदी सरकार ने पिछले वर्ष ओबीसी आरक्षण में श्रेणी विभाजन पर विचार करने के लिए जो समिति बनायी थी, वह इसी का हिस्सा थी. इस प्रयास में बड़ा व्यवधान उत्तर प्रदेश से आया. पिछले दिनों संपन्न गोरखपुर और फूलपुर संसदीय उपचुनाव में सपा-बसपा एक हो गये. इस अप्रत्याशित गठबंधन ने भाजपा को हरा दिया.
पिछड़ी और दलित जातियों का प्रतिनिधित्व करनेवाले इन क्षेत्रीय दलों को इस दोस्ती में भाजपा के दलित-पिछड़ा दांव की काट दिखायी दी. इसलिए इसे वे 2019 तक चलाने को राजी हो गये. भाजपा को इस जातीय गठबंधन का मुकाबला करने के लिए किसी बड़े दांव की जरूरत थी.
सो, उतर प्रदेश की योगी सरकार ने एक पुराना फॉर्मूला सरकारी फाइलों से बाहर निकाल दिया. इसमें एमबीसी की 17 उपजातियों को अनुसूचित जाति की सुविधाएं देने का प्रस्ताव है. मजे की बात है कि यही प्रस्ताव उत्तर प्रदेश के चार पूर्व मुख्यमंत्री पांच बार ला चुके हैं. 1995 और 2004 में सपा के मुलायम सिंह, 2008 में बसपा की मायावती और 2013 में सपा के अखिलेश यादव ने यही प्रस्ताव मंजूरी के लिए केंद्र सरकार को भेजा था.
2001 में भाजपा के तत्कालीन मुख्यमंत्री राजनाथ सिंह ने भी थोड़ा बदलकर इसे केंद्र को भेजा था. ऐसा चुनावों के मौके पर एमबीसी जातियों का समर्थन पाने के लिए किया गया था. सबको मालूम था कि केंद्र में सत्तारूढ़ दूसरे दलों की सरकार इस प्रस्ताव को मंजूरी नहीं देगी. ऐसे में एमबीसी जातियां उनके पक्ष में और केंद्र में सत्तारूढ़ दल के खिलाफ हो जायेंगी. इस बार योगी सरकार की यह चाल उनके खिलाफ भी जा सकती है, क्योंकि केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा की सरकार है. प्रस्ताव मंजूर न हुआ तो पांसा उल्टा पड़ सकता है.
आशय यह कि चुनाव के समय ही राजनीतिक दलों को एमबीसी की याद आती है. दुर्भाग्य यह कि ओबीसी आरक्षण पिछड़ी जातियों के उत्थान की बजाय राजनीतिक दांव ही बनता आया है.
1990 में तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह ने जब मंडल आयोग की रिपोर्ट लागू करके ओबीसी आरक्षण का रास्ता खोला था, तब भी वह उनका ‘राजनीतिक ब्रह्मास्त्र’ था. उनकी अल्पमत वाली सरकार अधर में थी और अयोध्या में राममंदिर बनाने के अभियान से भाजपा हिंदूध्रुवीकरण में लगी हुई थी. उनकी इस चाल को ‘कमंडल’ के जवाब में ‘मंडल’ का जबर्दस्त दांव कहा गया था.
जिस आरक्षण विरोध की आग में देश उबला था, वह आज तक राजनीतिक दांव ही बना हुआ है. आज आरक्षण का विरोध कोई पार्टी नहीं कर रही. कभी ‘मंडल’ का विरोध करनेवाली भाजपा आज ‘कमंडल’ के साथ ‘मंडल’ को भी चतुराई से साध रही है.

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