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Birthday Special : जानिए झारखंड से क्या रिश्ता था ईश्वरचंद्र विद्यासागर का, क्यों जनजातीय उन्हें देते थे भगवान का दर्जा

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झारखंड के कर्माटांड से ईश्वरचंद्र विद्यासागर का गहरा नाता रहा है, यहां उन्होंने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष बिताये और जनजातीय समुदाय की बेहतरी के लिए कार्य किया.

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Birthday Special : झारखंड के लिए यह सौभाग्य की बात है कि बांग्ला लिपि और बांग्ला भाषा के पितामह कहे जाने वाले और महान समाज सुधारक व समाजसेवी ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष कर्माटांड में बिताये थे. यह जगह ईश्वरचंद्र विद्यासागर की कर्मभूमि थी. कर्माटांड वर्तमान में जामताड़ा जिले में स्थित है. कर्माटांड में उन्होंने अपने निवास स्थान का नाम ‘नंदन कानन’ रखा था.

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संथालों के उत्थान के लिए किये कई काम

ईश्वरचंद्र केवल एक विद्वान ही नहीं थे, बल्कि वे समाजसेवी और समाज सुधारक भी थी. कर्माटांड में वे न केवल संथालों के बीच रहते थे, बल्कि उन्होंने उनके सामाजिक उत्थान के लिए भी काफी काम किया. चूंकि वे लड़कियों के शिक्षा के पक्षधर थे, सो यहां रहते हुए उन्होंने संथाल लड़कियों को शिक्षित करने का बीड़ा उठाया. इसके लिए उन्होंने कर्माटांड के प्रथम औपचारिक विद्यालय की शुरुआत की, जो देश का संभवत: पहला औपचारिक बालिका विद्यालय भी था. उन्होंने इन जनजातीय समुदाय को चिकित्सा प्रदान करने के लिए एक कर्माटांड में एक होम्योपैथी क्लिनिक भी खोला, जिसमें नि:शुल्क उपचार होता था. इतना ही नहीं, उन्होंने जनजातीय समुदाय के वयस्कों को भी शिक्षित करने का प्रयास किया. सामाजिक उत्थान के लिए किये गये उनके इन प्रयासों के चलते जनजातीय समाज उन्हें भगवान की तरह पूजते थे.

गरीबी में बीता बचपन

ईश्वरचंद्र विद्यासागर का पूरा नाम ईश्वरचंद्र बंदोपाध्याय था. उनका जन्म 26 सितंबर 1820 (आश्विन 12, बांग्ला वर्ष 1227) को वीरसिंघा गांव के हुगली (वर्तमान में मिदनापुर जिला, पश्चिम बंगाल) में हुआ था. विद्यासागर का बचपन अत्यंत गरीबी में बीता, परंतु गरीबी उनके जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने से उन्हें रोक नहीं पायी. उनके पिता ठाकुरदास बंदोपाध्याय और मां भगवती देवी धार्मिक प्रवृति के थे. ईश्वरचंद्र बचपन से ही मेधावी थे. उनके भीतर ज्ञान प्राप्ति की जिज्ञासा बहुत तीव्र थी, सो वे स्ट्रीट लाइट के नीचे बैठकर पढ़ा करते थे. चूंकि गरीबी इतनी थी कि घर में गैस लैंप जलाने के लिए भी पैसे नहीं होते थे. वर्ष 1839 में उन्होंने कानून की परीक्षा उत्तीर्ण की और 1841 में महज 21 वर्ष की उम्र में फोर्ट विलियम कॉलेज के संस्कृत विभाग के विभागाध्यक्ष बन गये.

अपनी बहू के रूप में किया एक विधवा का चुनाव

ईश्वरचंद्र विधवा विवाह के पक्षधर थे और इसके लिए पूरे जोर-शोर से जन-जागरूकता अभियान चलाते रहे और सरकार के सामने इस मामले को उठाते रहे, जब तक कि इसके लिए कानून नहीं बन गया. उनके ही प्रयासों का फल रहा कि 26 जुलाई, 1856 को ‘विधवा विवाह’ सरकार द्वारा वैध कर दिया गया. विधवा विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए उन्होंने अपने बेटे का विवाह एक विधवा स्त्री से करवाया था.

जब घर छोड़ आदिवासी समुदाय के साथ रहने लगे

ईश्वरचंद्र अपना जीवन बिल्कुल साधारण तरीके से जीते थे. वे अपनी माता द्वारा बनाये गये साधारण सूती वस्त्र धारण किया करते थे. यह सिलसिला तब तक चला, जब तक उनकी माताजी जीवित रहीं. एक समय ऐसा भी आया जब ईश्वरचंद को अपने परिवार का स्वार्थी व क्षुद्र व्यवहार कचोटने लगा. इससे तंग आकर उन्होंने अपने परिवार के साथ संबंध तोड़ दिया और अपने जीवन के अंतिम 18 वर्ष आदिवासी जनता के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया. यही वह 18 वर्ष थे जब वे झारखंड के कर्माटांड में संथाल समुदाय के बीच रहते हुए उनके कल्याण कार्यों में संलग्न रहे.

बिहार के बांग्ला समुदाय ने पाई-पाई जोड़ बचाया ‘नंदन कानन’

ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने 70 वर्ष की उम्र में (29 जुलाई, 1891) जब इस दुनिया से विदा ली, तब रबींद्रनाथ ठाकुर के उनके लिए शब्द थे- ‘कैसे ईश्वर ने, चालीस लाख बंगालियों में, एक मनुष्य को पैदा किया.’ उनकी मृत्यु के बाद, कर्माटांड स्थित उनके निवास स्थान ‘नंदन कानन’ को उनके बेटे ने कोलकाता के मलिक परिवार को बेच दिय. इससे पहले कि नंदन कानन को ध्वस्त कर दिया जाता, बंगाली एसोसिएशन, बिहार ने इसे बचाने का प्रयास शुरू कर दिया. एसोसिएशन ने घर-घर जाकर एक-एक रुपये का अनुदान एकत्रित किया और 29 मार्च, 1974 को नंदन कानन खरीद लिया. उनके निवास स्थान का मूल रूप आज भी उसी तरह व्यवस्थित है, जैसे पहले हुआ करता था. यहां उनकी सबसे मूल्यवान संपत्ति के रूप में 141 वर्ष पुरानी ‘पालकी’ है, जिसे स्वयं ईश्वरचंद्र प्रयोग किया करते थे.

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