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साढ़े चार सौ पृष्ठों में भी नहीं समा सका दियारे का दर्द

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दियारे से तात्पर्य प्रायः उन गांवों से होता है, जो बालू की भीत की भांति कभी भी बिखर सकते हैं. न घर का पक्कापन , न जीविका का भरोसा.

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मोहनपुर : दियारे से तात्पर्य प्रायः उन गांवों से होता है, जो बालू की भीत की भांति कभी भी बिखर सकते हैं. न घर का पक्कापन , न जीविका का भरोसा. नदी तट का निवास. जैसे पानी की सतह पर लिखी गयी जिंदगानियों की कच्ची इबारतें, जिन्हें नदी कभी भी लील ले. पटोरी अनुमंडल का दक्षिणवर्ती भूभाग ऐसी ही विकट विभीषिकाओं से लड़ता रहा है. बाढ़ और कटाव से लड़ते हुए यहां का आदमी समूची उम्र घर बनाने में लगा देता है, तब भी अपनी अगली पीढ़ियों के लिए घर नहीं बना पाता. इसी दर्द को उकेरा है साढे चार सौ पृष्ठों के उपन्यास ”””””””” डोरि तेहि पानी ”””””””” ने. इसके लेखक अश्विनी कुमार आलोक इसी दियारे के निवासी रहे हैं. उन्होंने करीब साढ़े तीन सौ साल पूर्व की कथा से शुरुआत की है और आज से पचास साल पूर्व की कथा तक उपन्यास को खत्म कर दिया है. उन्होंने बताया कि दर्द इतना है कि एक खंडा में नहीं समा सकता, दो खंड और लिखे जायेंगे. यह उपन्यास बरुआ नामक एक गांव के इर्दगिर्द घूमता है. लेकिन इस उपन्यास में सिर्फ बरुआ गांव ही नहीं है उसके साथ एक ग्राम समूह है. उपन्यास के केंद्रीय पात्र लेखक के दादा दानी पंडित हैं, लेकिन उनके साथ गांवों के दर्जनों लोग, पशु-पक्षी और पेड़-पौधे भी हैं. खेती और बैल-गाय, कुएं- चापाकल भी हैं. साढ़े तीन सौ साल पहले आबाद हुआ गंगा नदी के तट का यह इलाका कभी भी चैन से नहीं रह सका. कटावों ने लोगों के सिर्फ घर नहीं काटे, खेती-किसानी को भी उलटकर रख दिया. लेकिन गंगा नदी लोगों का हौसला नहीं कमजोर कर सकी. अनेक गांवों मार डाले गये, लेकिन नयी जमीन पर उनका पुनर्जन्म भी हुआ. उन्होंने बताया कि यह उपन्यास बरुआ नामक एक गांव के जन्म से लेकर मृत्यु तक की कथा है. जिसमें दर्द है, लेकिन यह दर्द संस्कृति बनकर साथ चलता है. उपन्यास यह बताने की चेष्टा करता है कि दियारे के जनजीवन की डोर पानी के हाथ में है, जब चाहे डुबा दे. ग्रामीण शब्दों के संयोग से लिखे गये इस उपन्यास को फणीश्वरनाथ रेणु की आंचलिक शैली का विलक्षण उपन्यास माना जा रहा है. पद्मश्री उषाकिरण खान ने उपन्यास की भूमिका में लिखा भी है कि इस उपन्यास के लेखक के रूप में पचास वर्षों के बाद फणीश्वरनाथ रेणु का पुनरागमन हुआ है. उपन्यास में तत्कालीन राजनीति, प्रेम, पर्यावरण और सामाजिक स्वरूप के सभी अंगों का ताना-बाना बुना गया है. इसकी खासियत यह है कि इसके सभी पात्रों के मूल नाम दिये गये हैं. बरुआ गांव धरनीपट्टी पश्चिमी पंचायत में था, अश्विनीकुमार आलोक इसी गांव के रहनेवाले प्रसिद्ध उद्घोषक बैद्यनाथ पंडित प्रभाकर के पुत्र हैं. उनकी कुल इकतालीस पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं. उन्होंने बताया कि ”””””””” डोरि तेहि पानी ”””””””” के दूसरे खंड में गंगा तट के जलदस्युओं, अपहरण उद्योग और बदले हुए समाज को समेटने का प्रयास किया जा रहा है. सड़क, सुविधा और संसाधनों का अभाव झेलनेवाले गांवों के इतिहास को औपन्यासिक स्वरूप देने की यह कोशिश न सिर्फ साहित्य, बल्कि समाजशास्त्र के दृष्टिकोण से भी अभूतपूर्व है.

डिस्क्लेमर: यह प्रभात खबर समाचार पत्र की ऑटोमेटेड न्यूज फीड है. इसे प्रभात खबर डॉट कॉम की टीम ने संपादित नहीं किया है

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