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गया के देहाती इलाकों में भी बनने वाले मकानों के नक्शे हुए महंगे, आवेदन की संख्या में आयी कमी

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गया के ग्रामीण इलाकों में घर का नक्शा पास करवाने के लिए आवेदन करने वालों की संख्या में कमी आई है. फीस बढ़ने के बाद यह स्थिति पैदा हुई है

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गया शहर के साथ देहाती क्षेत्रों में मकान व अन्य तरह के निर्माण के लिए निगम से नक्शा पास कराना महंगा हो गया है. इससे यहां आवेदन करने वालों की संख्या में भारी कमी आ गयी है. निगम को आयोजना क्षेत्र (शहर के बाहरी इलाके में) में भी लोगों के आवेदन पर नक्शा पारित करना है. लेकिन, फीस बहुत अधिक बढ़ने के बाद आवेदन न के बराबर आने लगे हैं.

गौरतलब है कि नक्शा पारित कराने के लिए निगम की ओर से तय आर्किटेक्ट से नक्शा बनवाकर जमा करना होता है. जमीन के कागजात की जांच के लिए सीओ को भेजा जाता है. इसके बाद अमीन, कनीय अभियंता, सहायक अभियंता, कार्यपालक अभियंता, नगर आयुक्त जांच कर एप्रूवल देते हैं.

आवेदक को नक्शा के लिए निगम की तय फीस को जमा करना होता है. इसके अलावा लोगों को मकान के निर्माण में आने वाले खर्च का एक प्रतिशत रुपये लेबर वेल्फेयर के लिए लेबर ऑफिस में जमा कर रसीद लेनी होती है. इसके बाद नक्शा पारित कर दिया जाता है. निगम से मिली जानकारी के अनुसार, अब नक्शा पारित कराने वही लोग पहुंच रहे जो एकदम श्योर हो जाते हैं कि नक्शा बनवाने के बाद उनका लोन मिल जायेगा.

शहर के इन बाहरी हिस्सों में निगम को नक्शा पास करने का है अधिकार

  • रोड का नाम- इलाका
  • गया से पटना रोड- रसलपुर, बारा, तकिया, चाकंद तक
  • गया से पंचानपुर रोड- कुजाप, केवाली, दूर्वे, कसमा तक
  • गया से भुसुंडा रोड- बंधुआ तक
  • गया से चेरकी रोड- विशुनगंज तक
  • गया-डोभी रोड- हिरया, दुबहल तक
  • गया से परैया रोड में- कष्ठा तक

देहाती इलाकों में भी देनी होती है लेबर वेल्फेयर फीस

देहाती इलाका में भी किसी तरह के मकान बनाने में 10 लाख से अधिक खर्च आता है, तो आवेदक को निगम फीस के साथ एक प्रतिशत लेबर वेल्फेयर को फीस देनी पड़ती है. यह टैक्स हजारों में पहुंच जाता है. पहले एक कट्ठा का नक्शा 15-20 हजार रुपये में निगम से बन जाता था. अब यही नक्शा बनाने में 50-60 हजार रुपये का खर्च आता है.

क्या कहते हैं मेयर

सरकार के निर्देश के अनुसार ही फीस ली जाती है. इसका स्थानीय स्तर पर कोई मतलब नहीं होता है. ग्रामीण इलाकाें में भी निगम से नक्शा पारित होने के बाद उसकी फीस को सरकार के खाते में भेज दिया जाता है. फीस निगम के खाते में जमा नहीं होती है.

डॉ वीरेंद्र कुमार उर्फ गणेश पासवान

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