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दो विजयी पलों की एक लघुकथा

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चंदन श्रीवास्तव एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस दिल्ली चुनाव के बाद वोटों का वर्गवार आंकड़ा इस तथ्य की निशानदेही करता है कि दिल्ली की गरीब आबादी ने बीते नौ महीनों के भीतर विकास के गुजरात मॉडल को गरीब विरोधी पाकर पूरी तरह से नकार दिया है. दिल्ली के लोगों ने हमें बड़ा डरावना जनादेश दिया है.’ 95 […]

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चंदन श्रीवास्तव

एसोसिएट फेलो, सीएसडीएस

दिल्ली चुनाव के बाद वोटों का वर्गवार आंकड़ा इस तथ्य की निशानदेही करता है कि दिल्ली की गरीब आबादी ने बीते नौ महीनों के भीतर विकास के गुजरात मॉडल को गरीब विरोधी पाकर पूरी तरह से नकार दिया है.

दिल्ली के लोगों ने हमें बड़ा डरावना जनादेश दिया है.’ 95 प्रतिशत सीटों पर जीत के बाद अरविंद केजरीवाल की पहली प्रतिक्रिया यही थी. नौ महीने पहले भाजपा को भी ऐसी ही जीत मिली थी. तब जीत के नायक नरेंद्र मोदी की प्रतिक्रिया कुछ दूसरी थी. उन्होंने कहा था, ‘भाजपा को मिला जनादेश पराजितों को अपमानित करने के लिए नहीं है. बगैर एक भी जनसभा किये वड़ोदरा में मिली जीत को मैं अपने राजनीतिक कैरियर की सबसे बड़ी उपलब्धि मानता हूं.’

इन दो प्रतिक्रियाओं के मिजाज में फर्क जाहिर है. भारी बहुमत से मिली जीत का क्षण केजरीवाल को ‘डरावना’ लगा, जबकि मोदी ने अपनी जीत को ‘राजनीतिक कैरियर की सबसे बड़ी उपलब्धि’ के रूप में देखा. केजरीवाल के लिए पार्टी की जीत का क्षण दरअसल आत्म-समीक्षा का क्षण था, यह सोचने का अवसर कि क्या मैं इस जनादेश का भार वहन करने लायक हूं. दूसरी ओर, मोदी के लिए जीत का क्षण किसी विकट युद्ध में मिली जीत का क्षण था, एक गौरव का क्षण, जब यह नैतिक दायित्व याद आये कि पराजित भी विजेता की कृपा के भागी होंगे.

दोनों नेताओं की ये प्रतिक्रियाएं स्पष्ट ही दो अलग-अलग किस्म की राजनीति का संकेत देती हैं. केजरीवाल के लिए जीत का पल एक नेता के रूप में अपनी क्षमताओं के मूल्यांकन का पल था. अपनी क्षमताओं के मूल्यांकन की जरूरत पड़ती है, जब आपको याद रहे कि जिसने आपको नेतृत्व सौंपा है, वह आपकी परीक्षा लेगा और अपनी कसौटी पर खरा ना उतरने पर आपके सर का ताज छीन लेगा. जीत का क्षण आत्म-समीक्षा का क्षण उसी नेता के लिए हो सकता है, जो मानता हो कि उसकी शक्ति का केंद्र स्वयं उसके भीतर नहीं, बल्कि उस जनता में निहित है, जिसने वोट देकर उसे अपना प्रतिनिधि नियुक्त किया है.

जो नेता जीत के क्षण को अपनी निजी उपलब्धि के क्षण के रूप में देखता है, उसके लिए अपनी नेतृत्व क्षमता के मूल्यांकन का प्रश्न ही नहीं उठता. वह मानता है कि नेतृत्व की शक्ति का केंद्र स्वयं उसके भीतर है और जनता से मिले वोटों ने इसकी तस्दीक की है. चुनावी लड़ाई में मिली जीत का पल इसी कारण उसके लिए अपनी नेतृत्व क्षमता को मिली शाबाशी का पल होता है.

तर्क दिया जा सकता है कि दोनों नेताओं की पहली प्रतिक्रियाओं के मिजाज का यह अंतर उनके अलग-अलग अनुभवों की उपज है. मोदी ने प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में जब लोकसभा का चुनाव लड़ा, तो उनके पास अपने नेतृत्व की उपलब्धियों के बखान के लिए गुजरात मॉडल था.

केजरीवाल के पास अपनी नेतृत्व क्षमता को सिद्ध करनेवाला कोई मॉडल नहीं था. कुल 49 दिनों की जिन उपलब्धियों की बात करते हुए वे चुनावी मैदान में उतरे, उन 49 दिनों के कामकाज पर ‘भगोड़ा’ का ठप्पा लगा था. सो, केजरीवाल के लिए 95 प्रतिशत सीटों पर मिली जीत को डरावना कहना उतना ही स्वाभाविक है, जितना कि मोदी के लिए लोकसभा की अपनी जीत को निजी उपलब्धि के रूप में सोचना. दोनों के राजनीतिक अनुभवों को आधार बनानेवाला यह तर्क स्थिति की व्याख्या के लिए कारगर तो है, लेकिन पर्याप्त नहीं. क्योंकि लोकसभा के चुनाव पूरे देश के लिए होते हैं, दिल्ली तो कायदे से अभी एक प्रदेश भी नहीं.

लेकिन मई, 2014 के चुनावी नतीजों से फरवरी, 2015 के चुनावी नतीजों की तुलना तो की जा रही है. तुलना करने का अवसर खुद मोदी ने दिया है. मोदी ही ने दिल्ली विधानसभा के चुनाव के वक्त यह जुमला उछाला कि ‘जो देश का मूड है वही दिल्ली का भी मूड है.’ इस चुनावी जुमले ही के कारण मतदाताओं के बीच दिल्ली विधानसभा का चुनाव विकास के मोदी-छाप ‘गुजरात मॉडल’ पर एक रेफरेंडम बन गया. दिल्ली में वोट डालनेवाले 89 लाख मतदाताओं में से 54 प्रतिशत को लगा कि यह मॉडल उनकी आकांक्षाओं पर खरा नहीं उतरता.

इन 54 प्रतिशत मतदाताओं में गरीब बहुत ज्यादा थे. सीएसडीएस (लोकनीति) ने अपने चुनाव-बाद सर्वेक्षण में पाया कि दिल्ली के उन 21 प्रतिशत गरीबों में जिनकी मासिक आय सिर्फ 7 हजार रुपये है, ‘आप’ को 66 प्रतिशत वोट मिले. दिल्ली की 39 प्रतिशत आबादी महीने में साढ़े तेरह हजार रुपये कमाती है और इस तबके में ‘आप’ को 57 फीसदी वोट मिले.

14 हजार से लेकर 31 हजार रुपये मासिक आय पर गुजारा करनेवाली दिल्ली की तकरीबन 33 प्रतिशत आबादी में ‘आप’ को 51 प्रतिशत वोट मिले. वोटों का यह वर्गवार आंकड़ा इस तथ्य की निशानदेही करता है कि दिल्ली की गरीब आबादी ने बीते नौ महीनों के भीतर विकास के गुजरात मॉडल को गरीब-विरोधी पाकर नकार दिया है.क्या उम्मीद की जाये कि दिल्ली का जनादेश नरेंद्र मोदी के लिए आत्म-संशय और आत्म-परीक्षा का क्षण साबित होगा?

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