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अंतरराष्ट्रीय छवि और आंतरिक मुद्दे

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प्रो पुष्पेश पंत अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार pushpeshpant@gmail.com फिलहाल यूरोपीय संसद ने उस प्रस्ताव पर मतदान स्थगित कर दिया है, जिसमें भारत से नागरिकता संशोधक कानून में धर्म के आधार पर उत्पीड़ित शरणार्थियों के बीच भेदभाव बरतने का आरोप लगाने के बाद इसे लागू न करने का आग्रह किया गया था. हमारी सरकार के पक्षधर […]

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प्रो पुष्पेश पंत
अंतरराष्ट्रीय मामलों के जानकार
pushpeshpant@gmail.com
फिलहाल यूरोपीय संसद ने उस प्रस्ताव पर मतदान स्थगित कर दिया है, जिसमें भारत से नागरिकता संशोधक कानून में धर्म के आधार पर उत्पीड़ित शरणार्थियों के बीच भेदभाव बरतने का आरोप लगाने के बाद इसे लागू न करने का आग्रह किया गया था. हमारी सरकार के पक्षधर इसे भारतीय राजनय की बड़ी जीत मान कहे हैं.
लेकिन, उन्हें यह याद रखना चाहिए कि इस प्रस्ताव पर मतदान थोड़े समय के लिए ही टला है; इसे भारत के प्रतिरोध के बावजूद खारिज नहीं किया गया है और जब तक इस पर बहस जारी रहेगी, तब तक भारतीय राजनयिक बचाव की मुद्रा ग्रहण करने के लिए विवश रहेंगे. जाहिर है कि भारत की यह दलील कि यह उसका आंतरिक मामला है और राष्ट्रहित में यह कानून पारित करना उसका संप्रभु अधिकार है, यह दलील असरदार नहीं साबित हुई .
इस बात को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए कि भले ही यूरोपीय संसद को यूरोपीय समुदाय की परिषद का पर्याय नहीं समझा जा सकता, जो सदस्यों के आचरण को प्रभावित करनेवाले फैसले ले सकती है, यह ‘नाजायज’ हस्तक्षेप अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत को निरंतर कटघरे में खड़ा रखेगा. यह सुझाना नादानी है कि यूरोपीय संसद मात्र परामर्श का मंच है, इसे सदस्य देशों की नीतियों को मुखर या अनिवार्यत: प्रभावित करनेवाला नहीं मानना चाहिए. फ्रांस की सरकार ने यह एलान करते देर नहीं लगायी कि सीएए भारत का आंतरिक मुद्दा है, पर किसी और प्रभावशाली सदस्य देश ने ऐसा नहीं कहा.
आनेवाले दिनों में यह जटिल राजनयिक चुनौती भारत के सामने मुंह बाये खड़ी रहेगी और न ही यह यूरोप तक सीमित है. संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार आयुक्त ने इस कानून को मानवाधिकारों को बाधित करनेवाला मान इसकी आलोचना की है और अमेरिकी संसद की सुनवाई में इसका जिक्र भारत को संकोच में डालनेवाला सिद्ध हुआ है.
ब्रिटेन में चुनाव में लेबर पार्टी की करारी हार के पहले उस दल के नेता अपने (मौजूदा) भारत सरकार विरोधी तेवर दिखलाते रहे थे. इसी तरह अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के कई प्रमुख सदस्य न केवल इस कानून की वरन जम्मू-कश्मीर राज्य विषयक प्रशासनिक परिवर्तन को लेकर भी आशंकाएं जाहिर कर चुके हैं.
जैसे-जैसे अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव अभियान की सरगर्मियां तेज होंगी और विदेश नीति के मुद्दे सुर्खियों में आने लगेंगे, भारतीय उपमहाद्वीप के विवाद और ‘संकट’ बहस का विषय बनेंगे. इस भरोसे बैठे रहना अक्लमंदी नहीं कहा जा सकता कि भारत के मित्र डोनाल्ड ट्रंप के सत्तारूढ़ रहते हमारे राष्ट्रहित निरापद रहेंगे. फरवरी में ट्रंप भारत का दौरा करनेवाले हैं और यह आशा की जा रही है कि वह लगभग दस अरब डॉलर के नये सौदों को पटायेंगे, जिसके बाद अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते और घनिष्ठ होंगे. तथापि इस बात को रेखांकित करना परमावश्यक है कि ट्रंप का कार्यकाल समाप्तप्राय है और वह महाभियोग से जूझ रहे हैं.
उनके पुनर्निर्वाचन को निष्कंटक नहीं मान सकते और न ही यह बात निर्विवाद है कि भारत उनकी विश्वव्यापी रणनाति की प्राथमिकता है. भारत द्वारा बारंबार यह दोहराये जाने के बावजूद कि कश्मीर में प्रशासनिक बदलाव हो या नागरिकता विषयक कानून पारित करना भारत के आंतरिक मसले हैं, ट्रंप एकाधिक बार मध्यस्थता की निहायत गैर-जरूरी पेशकश कर चुके हैं.
अब तक भारत की छवि दुनिया के सबसे बड़े जनतंत्र वाली रही है. दुर्भाग्यवश सीएए तथा इसके साथ जुड़े नागरिकों के पंजीकरण के अभियान ने हमारे जनतंत्र के स्वरूप के बारे में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आशंकाओं को जन्म दिया है.
हमारे विद्वान और अनुभवी विदेश मंत्री का दावा है कि भारत की हस्ती का बाल बांका ‘वाशिंगटन पोस्ट’ जैसे विदेशी अखबार नहीं कर सकते और न ही वह पूर्वाग्रहग्रस्त भारत के आलोचक विदेशी नेताओं से मिलना जरूरी समझते हैं. उन्हीं का अनुसरण करते रेल मंत्री भी इस मशहूर अखबार के मालिक बेजो की हाल की भारत यात्रा के दौरान उन्हें ललकारने लगे- भारत में कारोबार बढ़ाना है, तो अपने संपादकों पर लगाम लगाओ, जो भारत विरोधी खबरें और संपादकीय छाप रहे हैं. नतीजा यह हुआ कि ‘वाशिंगटन पोस्ट’ के पत्रकार ने उन्हें खरी-खरी सुना दी- अमेरिका में मीडिया मालिकों या सरकार की जेब में नहीं रहता! विदेशी आलोचकों का मुंह बंद करवाने की उतावली नुकसानदेह नासमझी ही है.
स्वदेश में अपने से असहमत आंदोलनकारियों को औपनिवेशिक कानूनों के जरिये या राष्ट्रीय सुरक्षा के तर्क से चुप करानेवाला तरीका यहां काम नहीं आ सकता. याद रहे वह ‘दि इकोनॉमिस्ट’ नामक साप्ताहिक ही था, जिसने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की पहचान निकम्मे लाचार नेता वाली बना उनकी सरकार को लकवाग्रस्त घोषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.
‘टाइम’ पत्रिका के मनमोहन विरोधी तेवरों का लाभ मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा के चुनाव अभियान को हुआ था. आज जब वही ‘दि इकोनॉमिस्ट’ भारत में बढ़ती असहिष्णुता पर चिंता प्रकट करता है, तो उसे एकाएक भारत-द्वेषी करार देना तर्कसंगत नहीं है. यह पत्रिका भारतीय प्रधानमंत्री के सशक्त नेतृत्व की समर्थक रही है. इसकी आलोचना को औपनिवेशिक नस्लवाद का लक्षण कहकर खारिज करना आसान नहीं. न ही यह बात तर्कसंगत लगती है कि उदीयमान भारत की नाक में नकेल कसने के लिए कोई विश्वव्यापी साजिश रची जा रही है.
यह कड़वा सच कबूल करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि नागरिकता कानून के संशोधन का विरोध करनेवालों के बलपूर्वक दमन ने अप्रत्याशित राजनीतिक उथल-पुथल को जन्म दिया है. पहले से चली आ रही आर्थिक मंदी के सन्निपात के कारण इस घटना ने भारत में विदेशी निवेशकों को चिंतातुर किया है. यह मुद्दा भारत की संप्रभुता के कवच के प्रयोग से अंतरराष्ट्रीय बहस में वर्जित नहीं रह सकता.
आज के विश्व में संप्रभुता किसी भी राज्य को अपने क्षेत्राधिकार में निरंकुश आचरण का एकाधिकार नहीं देती. इसी कारण आंग सान सू ची को अंतरराष्ट्रीय अदालत में पेश होना पड़ा है. हालांकि, अमेरिका हो या चीन या रूस खुद को अंतरराष्ट्रीय कानून की व्यवस्था परंपरा से बाध्य नहीं मानते. पर क्या इस घड़ी भारत अपनी तुलना इनसे कर सकता है और प्रतिद्वंद्वियों के ही नहीं, बांग्लादेश और जापान जैसे मित्रों की बेचैनी को भी अनदेखा कर सरता है? आंतरिक मुद्दों और विदेश नीति को अलग-अलग रखना कठिन होता जा रहा है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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