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Karma Puja 2024: झलहेर के साथ करमा धरमा पर्व का समापन, यहां राज परिवार निभा रहा सदियों पुरानी परंपरा

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Karma Puja 2024: मधुबनी जिले के मधेपुर प्रखंड स्थित पचही डयोढ़ी में यह पर्व धूमधाम से मनाया गया. पचही के एतिहासिक तालाब में झलहेर पूजा के साथ करमा धरमा पर्व के समापन के वक्त पांच कोस के सैकड़ों लोग शामिल हुए. इस वर्ष पंडित अरुण झा ने झलहेर पद्धति से पूजा सम्पन करवाया.

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Karma Puja 2024: पटना. आदिवासियों का प्रमुख पर्व करमा मिथिला में झलहेर के साथ संपन्न हुआ. झारखंड के साथ साथ मिथिला में भी प्रकृति पूजक पर्व करमा का आयोजन वर्षों से होता आ रहा है. वर्षों से मिथिला का राज परिवार राजकीय पर्व के रूप में इस पर्व को मनाता आ रहा है. अभी तिरहुत नरेश खुद इस पर्व में शामिल हुआ करते थे. कालांतर में जहां इस प्रकृति पर्व को सनातनी चोले से ढक दिया गया, वहीं इसका आयोजन भी अब महज खानापूर्ति ही कही जा सकती है. वैसे हर साल ही तरह इस साल भी मधुबनी जिले के मधेपुर प्रखंड स्थित पचही डयोढ़ी में यह पर्व धूमधाम से मनाया गया. पचही के एतिहासिक तालाब में झलहेर पूजा के साथ करमा धरमा पर्व के समापन के वक्त पांच कोस के सैकड़ों लोग शामिल हुए. इस वर्ष पंडित अरुण झा ने झलहेर पद्धति से पूजा सम्पन करवाया. इस अवसर पर डयोढ़ी के सदस्यों के अलावा कई गांवों के लोग मौजूद रहे.

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झलहेर के साथ ही होता है करमा धरमा का भसान

करमा पूजा के संबंध में राज परिवार के सदस्य श्रीपति सिंह ने बताया कि भाद्र शुक्ल एकादशी जिसे यहां के लोग कर्मा धर्मा एकादशी ओ जलझुलनी एकादशी भी कहते हैं, को करमा की पूजा होती है. इस दिन यहां मेला लगा रहता है. कई लोग जो व्रत करते हैं, वो झलहेर के बाद ही प्रसाद ग्रहण करते हैं. श्रीपति सिंह कहते हैं कि संध्या में आरती के बाद करमा धरमा पोखर में नौका विहार करते हैं, इसी कारण इसका नाम झलहेर है. पोखर में नाव के ऊपर मध्य में लकड़ी के तख्थे को रखा जाता है, जिसपर भगवान करमा धरमा विराजमान होते हैं. दोनों तरफ से चाल को पकड़ के भगवान को अगरबत्ती दिखाते हुए पोखर के चारों ओर घुमाने (झलहेर खेलने) के साथ इस पूजा की समाप्ति होती है. इतिहास रहा है, इस दिन बरसात जरूर होती है. इस पूजा की अपनी अलग पद्धति है, जिसके अनुसार प्रत्येक वर्ष झलहेर का आयोजन होता है. झलहेर के दौरान ही करमा धरमा का भसान हो जाता है. खास बात यह है कि भसान पुरुष नहीं बल्कि महिला के हाथों होता है.

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महाराज कुमार रमापति सिंह को मिली थी जिम्मेदारी

कर्मा धर्मा पूजा के आयोजन की जिम्मेदारी महाराजा माधव सिंह (राजकाल ; 1775 -1807 ) ने अपने छोटे बेटे रमापति सिंह को दे रखी थी और तब से आज तक उनका परिवार यह पर्व राजकीय पर्व के रूप में करता आ रहा है. महाराजकुमार रमापति सिंह के वंशज श्रीपति सिंह कहते हैं कि यह पर्व राज परिवार की ओर से मधेपुर डेओढी ही करता रहा है. कहा जाता है कि महाराज कुमार रमापति सिंह के बेटे बाबू पुण्यपति सिंह झलहेरि पूजा का आयोजन 1860 के आसपास मधेपुर से पचही ले आये, तब से यहीं हो रहा है. पहले तिरहुत नरेश भी इस पर्व में शामिल होने पचही आते थे. हजारों की भीड़ होती थी. बड़ा मेला लगता था. अब तो बस खानापूर्ति हो जा रही है. लोगों ने भी इसे आदिवासियों तक सिमटा दिया है. आम लोग इससे दूर होते गये. राज परिवार के सदस्य रूपेश्वर सिंह कहते हैं कि पहले ऐसा नहीं था. मैथिलीभाषाकोष (पं दीनबन्धु झा,1950) में लिखते हैं कि 1918 ई संस्करण के पृ 242 में ” झलहेरि = नौका से जलक्रीड़ा ” लिखा हुआ है, जिसमें सभी जाति के लोग शामिल होते थे. कल्याणीकोश( 1998 ; पं गोविन्द झा ) के पृ 246 में भी ” झलहेरि = नाव पर जल – विहार लिखा हुआ है. मैथिलीशब्दकल्पद्रुम( 1998 ; पं मतिनाथ मिश्र) के पृ 178 में ” झलहेर = नाव से जल भ्रमण लिखा हुआ है. इससे पता चलता है कि यह शब्द लोकभाषा का है.

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