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लोगों का मन मोहता लेता है कमलदह झील का सौंदर्य, राजा मेदिनीराय को था इससे बेहद लगाव

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इस झील के बारे में कई तरह की कहानियां भी प्रचलित है. अलग-अलग लोगों के द्वारा अलग-अलग रूप से इस झील की दास्तां सुनाई जाती है. इस झील की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गर्मियों में भी यह झील कभी नहीं सूखता है.

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संतोष कुमार, बेतला: पलामू प्रमंडल के ऐतिहासिक कमलदह झील का सौंदर्य बेजोड़ है. घने जंगलों की रोमांचकारी यात्रा के बीच कमलदह झील तक पहुंचकर अपने आंखों से इसे निहारना काफी मनोहारी है. इतिहासकार बताते हैं कि 360 वर्ष पूर्व पलामू के प्रसिद्ध राजा मेदिनीराय व उनकी रानी का इस झील से काफी लगाव था. कमल के फूलों से लबालब होने के कारण इसे कमलदह झील का नाम दिया गया था. राजा और रानी यहां घंटों समय गुजारते थे. मनोरंजन के लिए तैराकी भी करते थे. इतना ही नहीं, राजा मेदिनी के बाद भी अन्य जितने भी राजा हुए थे उनकी रानियां भी कमलदह झील तक आती थी और यहां अपनी सहेलियों के साथ स्नान किया करती थीं.

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इस झील के बारे में कई तरह की कहानियां भी प्रचलित है. अलग-अलग लोगों के द्वारा अलग-अलग रूप से इस झील की दास्तां सुनाई जाती है. इस झील की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि गर्मियों में भी यह झील कभी नहीं सूखता है. पानी बहुत कम जरूर हो जाता है. सालों भर पानी रहने के कारण इस झील के आसपास के जंगलों में जंगली जानवरों का जमावड़ा लगा रहता है. इस दौरान रास्ते में वहां जाते समय कभी हाथी तो कभी अन्य हिंसक जंगली जानवर मिलने की प्रबल संभावना होती है. इसलिए यहां जाने में काफी सावधानी बरतने की जरूरत होती है.

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खतरनाक है झील में उतरना

कमलदह झील जहां एक ओर खूबसूरती का एक बेहतरीन नमूना है तो वहीं दूसरी ओर यह खतरनाक भी है. इस झील में उतरना खतरनाक है. अब तक कई ऐसी घटना हो चुकी है जिसमें लोगों ने डूब कर अपनी जान दे दी है. इसलिए पर्यटकों को यहां काफी सावधानी बरतने की जरूरत होती है. बच्चों और महिलाओं के साथ आने पर विशेष ध्यान रखने की जरूरत पड़ती है. यहां झील में उतरने की इजाजत कतई नहीं दी जाती है. अक्सर दुर्घटना इसलिए हो जाती है. क्योंकि इस यह झील जल के अलावा कमल फूल से भी लबालब भरा होता है.लोग फूल तोड़ने के लिए झील में उतरने का प्रयास करते हैं और डूब जाते हैं.

प्रवासी पक्षियों का होता है आना जाना

कमलदह झील की सबसे बड़ी विशेषता यह भी है कि यहां प्रवासी पक्षियों का आना जाना लगा रहता है. कई वैसे पक्षियों को भी यहां देखा जा सकता है जो किसी विशेष मौसम में दूसरे प्रदेश से यहां आते हैं. कुछ दिन रुकने के बाद फिर वापस लौट जाते हैं. यह झील शोधकर्ताओं के लिए भी आकर्षण का केंद्र है. ऐतिहासिक कमलदह झील को संवारने का काम बेतला नेशनल पार्क प्रबंधन के द्वारा किया गया है. यहां वाच टावर बनाया गया है जिससे दूर दराज के जंगली जानवरों और पक्षियों को देखा जा सकता है.

कैसे पहुंचे कमलदह झील

कमलदह झील बेतला नेशनल पार्क गेट से छह किलोमीटर व किला रोड से करीब दो किलोमीटर की दूरी पर घने जंगलों के बीच अवस्थित है. लातेहार से 85 किमी और मेदिनीनगर से इसकी दूरी 30 किलोमीटर है. मेदिनीनगर या रांची से आने के क्रम में दुबिया खाड़ से सीधा बेतला आना होता है. इसके बाद बेतला होते हुए किला रोड में कमलदह झील तक पहुंचा जा सकता है. वही बरवाडीह रेलवे स्टेशन पर आने के बाद कुटमू मोड़ होते बेतला तक जाना होता है.

सुरक्षा का है पुख्ता इंतजाम

पलामू किला रोड में स्थित कमलदह झील बेतला नेशनल पार्क के क्षेत्र में आता है. इसलिए पूरी तरह से वन विभाग के अधीन है. वन विभाग के कर्मी हमेशा यहां निगरानी में लगे रहते हैं. आवश्यकता पड़ने पर बरवाडीह पुलिस बल भी यहां सुरक्षा के लिए मुस्तैद दिखती है. यहां आने वाले पर्यटक अपने साथ खाना पीना लेकर आते हैं. खाने पीने के लिए बेतला नेशनल पार्क जाना होता है. कमलदह झील देखने के बाद यदि पर्यटक चाहें तो बेतला में बने कई विश्रामगृह में ठहर सकते हैं. यहां रोजगार की असीम संभावनाएं हैं. प्रत्येक वर्ष हजारों की संख्या में वहां पर्यटक पहुंचते हैं.

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