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जलवायु की चिंता

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जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि के साथ उनके स्वरूप को भी बदल दिया है. पिघलते ग्लेशियर, समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी, भयावह बाढ़, असहनीय गर्मी और जंगलों की भीषण आग की खबरें हम आये दिन सुन रहे हैं. प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है. पर्यावरण विशेषज्ञों ने पोलैंड में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त […]

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जलवायु परिवर्तन ने प्राकृतिक आपदाओं में वृद्धि के साथ उनके स्वरूप को भी बदल दिया है. पिघलते ग्लेशियर, समुद्री जलस्तर में बढ़ोतरी, भयावह बाढ़, असहनीय गर्मी और जंगलों की भीषण आग की खबरें हम आये दिन सुन रहे हैं.

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प्रकृति हमें बार-बार चेतावनी दे रही है. पर्यावरण विशेषज्ञों ने पोलैंड में जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र की बैठक में फिर से आगाह किया है कि अगर वैश्विक स्तर पर सभी देशों की साझेदारी में मौजूदा संकट से निपटने के उपाय तुरंत नहीं किये, तो मानव सभ्यता का विनाश हो जायेगा. भारत उन देशों में शामिल है, जो मौसम में बदलाव से सबसे ज्यादा प्रभावित हैं या हो सकते हैं.

कुछ रिपोर्टों में आशंका जतायी गयी है कि कुछ सालों में भारत को पानी की कमी से जूझना पड़ सकता है. वर्ल्ड बैंक का आकलन है कि 2050 तक बढ़ते तापमान और मॉनसून की अनियमितता से भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हो सकता है. प्रदूषण और पर्यावरण क्षरण की समस्याएं भी विकराल होती जा रही हैं. ऐसे में भारत अपनी जवाबदेही के प्रति भी गंभीर है. वर्ष 2030 तक उत्सर्जन में 30 से 35 फीसदी की कमी करने तथा 40 फीसदी बिजली स्वच्छ स्रोतों से उत्पादित करने की दिशा में कोशिशें जारी हैं. सौर ऊर्जा के क्षेत्र में अनेक देशों के साथ भारत ने ठोस कदम उठाया है.

इस सम्मेलन में हमारे देश की ओर से भरोसा दिलाया गया है कि लक्ष्यों को निर्धारित समय से पहले पूरा कर लिया जायेगा. कार्बन उत्सर्जन के लिए सर्वाधिक जिम्मेदार विकसित देश हैं, पर वे समाधान की दिशा में अपेक्षित वित्तीय सहयोग नहीं कर रहे हैं. पेरिस समझौते को लेकर अमेरिका का रवैया बेहद नकारात्मक है.

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस मुद्दे पर जी-20 देशों से अलग खड़े हैं. हमारे सामने चुनौतियां बड़ी हैं और समय कम. इस स्थिति में एक ओर मौजूदा ऊर्जा तथा बुनियादे ढांचे के उत्सर्जन को नियंत्रित करने के उपाय जरूरी हैं, तो दूसरी तरफ भविष्य की योजनाओं में इसका ध्यान रखना होगा. अगले एक-डेढ़ दशक में इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में दुनियाभर में 90 ट्रिलियन डॉलर का निवेश संभावित है.

भारत में 2030 तक जिस बुनियादी संरचना की आवश्यकता है, उसके 70-80 फीसदी हिस्से का निर्माण होना अभी बाकी है. एक संतोषजनक बात यह है कि यदि वैश्विक स्तर पर पेरिस समझौते पर अमल हो, तो साल 2030 तक 26 ट्रिलियन डॉलर के आर्थिक लाभ भी हो सकते हैं. इस अवधि तक वायु प्रदूषण से होनेवाली सात लाख सालाना मौतों को भी रोका जा सकता है.

साल 2030 तक हमारे देश की 70 फीसदी राष्ट्रीय आय एवं रोजगार का स्रोत शहर होंगे. ऐसे में भारत को बहुत फायदा हो सकता है. यह भी जरूरी है कि आपदाओं को रोकने तथा मौसम के बदलाव के अनुरूप प्रबंधन पर भी समुचित ध्यान दिया जाये. उम्मीद है कि पोलैंड से दुनिया को बचाने के लिए सभी प्रतिभागी देश एक सुर में पहलकदमी की घोषणा करेंगे और उसे पूरा करने का संकल्प लेंगे.

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